नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के फैसले को संवैधानिक और वैध करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण का पूरा अधिकार है और केवल इसलिए इस प्रक्रिया को अवैध नहीं माना जा सकता कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और संविधान के प्रावधानों के अनुरूप है। अदालत के अनुसार, मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए इस तरह की प्रक्रिया जरूरी हो सकती है। दरअसल, बिहार में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है।
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इन याचिकाओं में NGO ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की याचिका भी शामिल थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने माना कि SIR प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाने में मदद मिली है।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने दलील दी थी कि आधार कार्ड और वोटर आईडी को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। आयोग ने यह भी बताया था कि जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं थे, उन्हें अपने पारिवारिक संबंधों से जुड़े दस्तावेज देने के लिए कहा गया था।
गौरतलब है कि SIR प्रक्रिया के बाद चुनाव आयोग ने करीब 65 लाख ऐसे नामों की सूची जारी की थी, जिन्हें बाद में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग के अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
