नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार (Right to Privacy) का इस्तेमाल कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी से अपने मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और होटल में रुकने की जानकारी छिपाने के लिए नहीं कर सकता है। विशेषकर तब जब मामला व्यभिचार साबित करने से जुड़ा हो। देश की सर्वोच्च अदालत ने उस व्यक्ति की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसने दावा किया था कि अदालत में ऐसी जानकारियां सार्वजनिक करना उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक मामलों में व्यभिचार (adultery) का आरोप साबित करने के लिए होटल बुकिंग रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मंगाने का आदेश देना निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के 10 मई, 2023 के फ़ैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने एक पति की उस चुनौती को खारिज कर दिया था जिसमें उसने फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश का विरोध किया था, जिसके तहत जयपुर के एक होटल से रिकॉर्ड (जहाँ उस पर दूसरी महिला के साथ ठहरने का आरोप था) और उसके दो मोबाइल नंबरों के CDR मंगाने को कहा गया था। पूर्व जस्टिस रेखा पल्ली की अध्यक्षता वाली हाई कोर्ट बेंच ने कहा था कि हालाँकि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह असीमित नहीं है और व्यापक जनहित में ज़रूरत पड़ने पर इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
हाई कोर्ट ने कहा था, हिंदू मैरिज एक्ट में व्यभिचार को तलाक़ का आधार माना गया है। इसलिए, यह बिल्कुल भी जनहित में नहीं होगा कि कोर्ट निजता के अधिकार के आधार पर ऐसे शादीशुदा व्यक्ति की मदद करे, जिस पर शादी के दौरान ही किसी दूसरी महिला के साथ यौन संबंध बनाने का आरोप हो। यह विवाद एक महिला द्वारा दायर तलाक़ की अर्ज़ी से शुरू हुआ था, जिसमें उसने अपने पति पर क्रूरता और व्यभिचार का आरोप लगाया था। पत्नी के अनुसार, उसका पति जयपुर के एक होटल में एक दूसरी महिला और उसकी बेटी के साथ ठहरा था। उसने होटल के बुकिंग रिकॉर्ड और पति के कॉल डिटेल रिकॉर्ड मंगाने की मांग की थी और तर्क दिया था कि व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए ये ज़रूरी हैं। पति ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि ऐसे रिकॉर्ड मंगाने से न केवल उसके निजता के अधिकार का, बल्कि दूसरी महिला के निजता के अधिकार का भी उल्लंघन होगा। उसने तर्क दिया कि रिकॉर्ड का खुलासा करने से उस महिला की प्रतिष्ठा पर सवाल उठेंगे और उसकी नाबालिग बेटी की वैधता और पितृत्व पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार असीमित या पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक और न्याय के हित में इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की ही एक संविधान पीठ के पुराने आदेश का हवाला दिया था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि विवाह से इतर सहमति से बनाए गए यौन संबंधों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें पति के होटल में ठहरने के रिजर्वेशन विवरण और कॉल डिटेल रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए गए थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार आवश्यक रूप से उचित प्रतिबंधों के अधीन है, खासकर तब जब ये प्रतिबंध जनहित में हों। हिंदू विवाह अधिनियम स्पष्ट रूप से व्यभिचार को तलाक के आधार के रूप में मान्यता देता है। इसलिए, यह बिल्कुल भी जनहित में नहीं होगा कि अदालत निजता के अधिकार की आड़ में किसी ऐसे विवाहित पुरुष की मदद करे, जिस पर अपनी शादी के अस्तित्व में रहते हुए बाहर किसी अन्य महिला से यौन संबंध बनाने का आरोप हो।”
हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया।
