कोलकोता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार करने वाली ममता बनर्जी का दांव नहीं चला। राज्यपाल आरएन रवि ने बंगाल विधानसभा को भंग कर दिया है। चार मई को आए चुनावी नतीजों में न सिर्फ ममता बनर्जी को भवानीपुर से हार का सामना करना पड़ा, बल्कि 15 सालों तक रही टीएमसी की सत्ता भी चली गई थी। भाजपा ने बंपर जीत हासिल करते हुए 207 सीटें हासिल की थी।
एक आधिकारिक नोटिफिकेशन के अनुसार, राज्यपाल आरएन रवि ने पश्चिम बंगाल राज्य विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद, सात मई से उसे भंग कर दिया है। वर्तमान विधानसभा का गठन मई 2021 में हुआ था, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी थी। विधानसभा का भंग किया जाना हाल ही में संपन्न हुए दो चरणों के चुनावों के बाद मौजूदा विधानसभा के कार्यकाल की औपचारिक समाप्ति का प्रतीक है।
चुनावी नतीजे लोगों का जनादेश नहीं, बल्कि साजिश थे, यह आरोप लगाते हुए ममता बनर्जी ने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद राज्य में एक संवैधानिक अनिश्चितता और राजनीतिक टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी। बनर्जी ने नतीजे को मनगढ़ंत बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि उनकी पार्टी भाजपा से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग से लड़ रही है।
विधानसभा भंग करने को लेकर क्या कहता है संविधान?
चुनाव आयोग ने संविधान के प्रावधानों और रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट के सेक्शन 15 के अनुसार नोटिफिकेशन जारी करके नई विधानसभा के विधायकों का चुनाव करा लिया है। नियम के हिसाब से विधानसभा भंग होने के बाद नए विधायकों को विनिंग सर्टिफिकेट दे दिए जाते हैं। एक बार सर्टिफिकेट बांट दिया जाए, तो पुराने विधायकों और मुख्यमंत्री कोई वैलिडिटी नहीं रहती। ऐसे में ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। अगर कानूनी भाषा में देखें तो वह ‘नॉन-एस्ट’ होगा. मतलब उनका कानूनी अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
