धर्म डेस्क(Bns)। धनतेरस के 13 दीपकों से शुरू होकर भाई दूज के 5 दीपकों तक पूरी होती है 64 दीपों की संख्या; घर के नक्शे में कमरा, पूजा घर, आंगन, रसोई, गौशाला और मुख्य द्वार सहित अलग-अलग स्थानों पर दीपक रखने का तरीका भी दिखाया गया है।
दीपावली का पर्व केवल एक दिन दीप जलाने तक सीमित नहीं है। धनतेरस से लेकर भाई दूज तक चलने वाले पांच प्रमुख पर्वों में दीपदान की अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। इसी क्रम में इन दिनों 64 दीपक जलाने से जुड़ा एक विशेष तरीका चर्चा में है। इसमें पांच दिनों के लिए दीपकों की संख्या निर्धारित करते हुए पूरे घर को रोशनी से सजाने का तरीका बताया गया है।
इस परंपरा के अनुसार धनतेरस से दीपक जलाने की शुरुआत होती है और भाई दूज पर 64 दीपकों का क्रम पूरा किया जाता है। वीडियो में घर का एक नक्शा दिखाकर यह भी समझाया गया है कि किस दिन घर के किन हिस्सों में दीपक रखे ज
ा सकते हैं।
पांच पर्व, 64 दीपक और उनका पूरा क्रम
इसमें दीपकों का विभाजन इस प्रकार बताया गया है—
धनतेरस – 13 दीपक: दीपोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। वीडियो में घर के अलग-अलग हिस्सों और प्रवेश द्वार के आसपास दीपक रखने का तरीका दिखाया गया है।
नरक चतुर्दशी – 14 दीपक: इस दिन दीपदान को यमराज के नाम से जोड़कर बताया गया है। घर के कमरों, आंगन, पूजा घर और अन्य स्थानों पर दीपक रखने की व्यवस्था दिखाई गई है।
दीपावली – 21 दीपक: लक्ष्मी पूजा के दिन घर के मुख्य द्वार, पूजा स्थल, आंगन, तुलसी के पास और घर के दूसरे हिस्सों में दीपक सजाने की बात बताई गई है।
गोवर्धन पूजा – 11 दीपक: इस दिन आंगन और घर के विभिन्न हिस्सों में दीपक जलाने की परंपरा को दर्शाया गया है।
भाई दूज – 5 दीपक: पांचवें दिन मुख्य द्वार और भाई के स्वागत से जुड़ी दीप सजावट के साथ इस क्रम को पूरा बताया गया है।
इस तरह पांचों दिनों के दीपकों की संख्या जोड़ने पर 13 + 14 + 21 + 11 + 5 = 64 होती है।
घर के नक्शे में दिखाए गए हैं दीपक रखने के स्थान
वीडियो में एक घर का पूरा नक्शा दिखाया गया है। इसमें कमरा और तिजोरी, पिछला द्वार, पूजा घर, छत की सीढ़ियां, आंगन, तुलसी, जल रखने का स्थान, गौशाला, रसोई और मुख्य द्वार को अलग-अलग हिस्सों में दर्शाया गया है। इसके अनुसार अलग-अलग दिनों में इन स्थानों पर दीपक बढ़ाते हुए कुल 64 दीपकों का क्रम पूरा किया जाता है।
इस प्रस्तुति में मुख्य उद्देश्य घर के किसी भी हिस्से को अंधेरे में न छोड़ने और पूरे घर को दीपों से सजाने का संदेश दिखाई देता है।
धनतेरस पर साबुत धनिया खरीदने की भी है परंपरा
धनतेरस से जुड़ी एक अन्य पारंपरिक मान्यता साबुत धनिया खरीदने की है। कई परिवार इस दिन धनिया खरीदकर मां लक्ष्मी की पूजा में रखते हैं। इसे धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कुछ परिवार पूजा के बाद इसे संभालकर रखते हैं, जबकि कुछ लोग बाद में मिट्टी में बो देते हैं। यह परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग तरीके से निभाई जाती है।
परंपरा के साथ सुरक्षा का भी रखें ध्यान
दीपक जलाते समय उन्हें पर्दों, कपड़ों और ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखना चाहिए। सीढ़ियों, रास्तों और दरवाजों पर दीपक इस तरह रखें कि किसी के आने-जाने में परेशानी न हो। बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से जलते दीपक दूर रखना भी जरूरी है।
बहरहाल, धनतेरस से भाई दूज तक दीपक जलाने की ये परंपराएं दीपोत्सव को पांच दिनों तक रोशनी और उत्साह से जोड़ती हैं। घर के हर कोने को रोशन करने का यह विचार त्योहार की खुशियों को परिवार के साथ साझा करने का संदेश भी देता है।
घर के नक्शे के अनुसार 64 दीपक इन स्थानों पर जलाने की बात बताई गई है:
1. मुख्य द्वार और प्रवेश मार्ग
2. पूजा घर
3. आंगन
4. तुलसी के पास
5. कमरों में
6. तिजोरी या धन रखने के स्थान पर
7. रसोई में
8. गौशाला में
9. छत की सीढ़ियों के पास
10. पीछे के दरवाजे और जल रखने के स्थान पर
ये दीपक पांच दिनों में इस तरह बांटे गए हैं:
धनतेरस – 13
नरक चतुर्दशी – 14
दीपावली – 21
गोवर्धन पूजा – 11
भाई दूज – 5कुल 64 दीपक।
अस्वीकरण: इस खबर में दी गई सभी जानकारियां धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और वास्तु संबंधी मान्यताओं पर आधारित हैं। हमारा उद्देश्य केवल इन परंपराओं की जानकारी पाठकों तक पहुंचाना है। हम इन मान्यताओं की पुष्टि या समर्थन नहीं करते। पाठक इन्हें अपनी आस्था और विवेक के अनुसार ही ग्रहण करें।
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