धर्म डेस्क(Bns)। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में **पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) की शुरुआत 27 सितंबर, रविवार से हो गई है।** यह अवधि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पितृ पक्ष का समापन **10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या** के साथ होगा।
पितृ पक्ष के दौरान परिवारजन अपने दिवंगत पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पारंपरिक कर्म करते हैं। मान्यता के अनुसार इन दिनों पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
पितृ पक्ष में तर्पण करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें, जनेऊ को दाएं कंधे पर रखें, और हाथ के अंगूठे (पितृ तीर्थ) से काले तिल व जल अर्पित करें।
trong>तर्पण की आवश्यक सामग्री
शुद्ध जल व गंगाजल
काला तिल (देव तर्पण में सफेद तिल और पितृ तर्पण में काले तिल का उपयोग होता है)
कुश (पवित्र घास जिसे हाथ में या अंगूठी के रूप में पहना जाता है)
जौ, चावल और सफेद फूल
तर्पण करने की सरल विधि
समय और स्थान: तर्पण हमेशा दोपहर या अपराह्न (मध्याह्न) के समय ही करें। सूर्यास्त के समय यह कर्म न करें।
मुद्रा और दिशा: अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें। जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखकर बाएं हाथ के नीचे ले आएं (अपसव्य मुद्रा)।
आह्वान: हाथ में जल और काले तिल लेकर अपने पूर्वजों का स्मरण करें और आह्वान मंत्र बोलें— “ॐ आगच्छन्तु में पितर इमम ग्रहन्तु जलान्जलिम।”
जल अर्पण: हाथ के अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग (पितृ तीर्थ) से जलांजलि धीरे-धीरे नीचे गिराएं।
मंत्र जाप: जल अर्पित करते समय “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” मंत्र का जाप करें।
### 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध
पितृ पक्ष के पहले दिन **27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध** है। पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 27 सितंबर की रात तक रहेगी।
श्राद्ध की विधि और समय स्थानीय पंचांग तथा परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए कर्मकांड के लिए स्थानीय विद्वान या पुरोहित से तिथि और मुहूर्त की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
### पितृ पक्ष में क्या किया जाता है?
पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। कई परिवार इस दौरान दान-पुण्य, जरूरतमंदों को भोजन कराने तथा पूर्वजों के स्मरण जैसे कार्य भी करते हैं। गया जैसे तीर्थस्थलों पर पिंडदान की विशेष धार्मिक परंपरा भी प्रचलित है।
### सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को
जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाता, उनके लिए **सर्वपितृ अमावस्या** को विशेष महत्व दिया जाता है। 2026 में यह **10 अक्टूबर** को होगी।
पितृ पक्ष भारतीय परंपरा में केवल कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने, परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने और उनके प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी माना जाता है।
पितृ पक्ष में क्या करें?
पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध किया जाता है. परिवार अपनी परंपरा के अनुसार पिंडदान, भोजन और दान-पुण्य भी करते हैं।
अन्न, वस्त्र और जरूरत की चीजों का दान करने की परंपरा भी कई परिवारों में है. इस दौरान पितरों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
अगर मृत्यु तिथि पता न हो तो?
कई बार परिवार को पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि पता नहीं होती. ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है. 10 अक्टूबर को पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या पर ऐसे पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
पितृ पक्ष का समापन कब होगा?
पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस दिन पितृ पक्ष के अंतिम श्राद्ध कर्म किए जाएंगे. इसके बाद नवरात्रि की शुरुआत होगी।
दुर्गा पूजा के 10 दिन — तिथियां और धार्मिक महत्व
पहला दिन (प्रतिपदा): घटस्थापना (कलश स्थापना) और मां शैलपुत्री की पूजा।
दूसरा दिन (द्वितीया): मां ब्रह्मचारिणी की पूजा।
तीसरा दिन (तृतीया): मां चंद्रघंटा की पूजा।
चौथा दिन (चतुर्थी): मां कूष्मांडा की पूजा।
पांचवां दिन (पंचमी): मां स्कंदमाता की पूजा।
छठा दिन (षष्ठी): महा षष्ठी, बोधन और पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा का पट खुलना। इसी दिन से मुख्य दुर्गा पूजा का आरंभ माना जाता है।
सातवां दिन (सप्तमी): महा सप्तमी और नवपत्रिका (कोलाबोऊ) पूजा।
आठवां दिन (अष्टमी): महा अष्टमी, महागौरी पूजा, कन्या पूजन और संधि पूजा।
नौवां दिन (नवमी): महानवमी, हवन और सिंदूर खेला।
दसवां दिन (दशमी): विजया दशमी (दशहरा), प्रतिमा विसर्जन और मां की विदाई।
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