धर्म-अध्यात्म डेस्क (Bns)। भगवान गणेश हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। उन्हें विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, बुद्धि-विवेक के देवता और प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी का स्मरण करने से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और शुभता का संचार होता है।

कैसे हुआ भगवान गणेश का जन्म?

भगवान गणेश के जन्म को लेकर पुराणों और धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण डाल दिए। माता पार्वती ने उस बालक को अपना द्वारपाल बनाया और कहा कि उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर प्रवेश न करने दिया जाए।

इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। बालक गणेश ने उन्हें पहचान नहीं पाया और माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें अंदर जाने से रोक दिया।

भगवान शिव और बालक गणेश के बीच विवाद बढ़ गया। कथा के अनुसार क्रोधित होकर भगवान शिव ने गणेश का मस्तक अलग कर दिया। जब माता पार्वती को यह पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं।

माता पार्वती ने भगवान शिव से अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने का आग्रह किया। इसके बाद भगवान शिव ने गणों को ऐसे जीव का सिर लाने का आदेश दिया, जिसका मुख उत्तर दिशा की ओर हो। गण एक हाथी का मस्तक लेकर आए। भगवान शिव ने हाथी का सिर बालक के धड़ से जोड़कर उसे पुनर्जीवित किया। इसी कारण वे गजानन कहलाए।

क्यों बने प्रथम पूज्य?

भगवान गणेश को प्रथम पूज्य बनाए जाने के पीछे भी एक प्रसिद्ध कथा है।

मान्यता है कि एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेय की परीक्षा लेने का निर्णय किया। दोनों से कहा गया कि जो सबसे पहले पूरे संसार की परिक्रमा करके वापस आएगा, उसे विजेता माना जाएगा।

कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर संसार की यात्रा के लिए निकल पड़े। भगवान गणेश का वाहन मूषक था। उन्होंने विचार किया कि उनके लिए पूरे संसार की परिक्रमा करना कठिन होगा।

इसके बाद गणेश जी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की तीन बार परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता ही उनके लिए पूरा संसार हैं।

उनकी बुद्धि और विवेक से प्रसन्न होकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद मिला। इसी मान्यता के कारण आज भी किसी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

गणेश जी को क्यों चढ़ाई जाती है दूर्वा?

भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा घास का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपरा में गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

गणेश पूजा में दूर्वा के साथ फूल, फल, अक्षत और अन्य पूजा सामग्री भी अर्पित की जाती है।

गणेश जी को मोदक क्यों प्रिय हैं?

भगवान गणेश को मोदक विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। यही कारण है कि गणेश पूजा और गणेशोत्सव के दौरान भक्त उन्हें मोदक का भोग लगाते हैं।

मोदक को ज्ञान और आनंद का प्रतीक भी माना जाता है। गणेश जी के हाथ में मोदक का होना उनके ज्ञान और आध्यात्मिक आनंद से जोड़ा जाता है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इसे भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर भक्त घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।

गणेशोत्सव के दौरान कई दिनों तक पूजा, आरती और भजन-कीर्तन किए जाते हैं। इसके बाद गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन को भगवान गणेश को भावपूर्ण विदाई देने और उनके पुनः आगमन की कामना से जोड़ा जाता है।

गणेश जी हमें क्या संदेश देते हैं?

भगवान गणेश का स्वरूप अपने आप में कई संदेश देता है।

बड़ा सिर हमें बड़े विचार रखने की सीख देता है।
बड़े कान अधिक सुनने और कम बोलने का संदेश देते हैं।
छोटी आंखें एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती हैं।
बड़ा पेट जीवन की अच्छी-बुरी बातों को सहने और पचाने का संदेश देता है।
मूषक वाहन इच्छाओं और मन पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।

यही वजह है कि गणेश जी को केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के देवता के रूप में भी पूजा जाता है।

गणपति बप्पा मोरया!

भगवान गणेश की कथा केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी कहानी नहीं है, बल्कि इसमें बुद्धि, आज्ञापालन, माता-पिता के सम्मान, धैर्य और विवेक जैसे जीवन-मूल्यों का संदेश भी मिलता है।

इसी विश्वास के साथ भक्त गणेश जी से अपने जीवन की बाधाएं दूर करने और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

साल 2026 में विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश 14 सितंबर, सोमवार को हमारे घरों और पंडालों में विराजेंगे। इस बार तिथियों के अद्भुत संयोग के कारण गणेशोत्सव पूरे 12 दिनों का होने जा रहा है, जो 14 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर 2026 (अनंत चतुर्दशी) को विसर्जन के साथ संपन्न होगा।

🗓️ गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त (14 सितंबर 2026)चतुर्थी तिथि प्रारंभ:

14 सितंबर को सुबह 07:06 बजे सेमूर्ति स्थापना का सर्वश्रेष्ठ (मध्याह्न) मुहूर्त: सुबह 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तकविशेष सावधानी: इस दिन सुबह 09:01 बजे से रात 08:09 बजे तक चंद्र दर्शन वर्जित है, क्योंकि इस समय चंद्र दर्शन करने से कलंक लगने का दोष (स्यामंतक मणि की कथा के अनुसार) होता है।

बप्पा की सेवा और पूजा विधिगणेश जी की सेवा बहुत सरल और भावपूर्ण है। घर में उनकी स्थापना और दैनिक सेवा इस प्रकार करें:स्थापना विधि: एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर अक्षत (चावल) का आसन देकर बप्पा की मूर्ति स्थापित करें। याद रखें, घर के लिए ला रहे मूर्ति की सूंड बाईं ओर होनी चाहिए।

दैनिक सेवा:
सुबह-शाम स्नान (प्रतीकात्मक रूप से गंगाजल छिड़ककर), चंदन का तिलक, अक्षत और सिंदूर लगाएं।भगवान गणेश को दूर्वा (दूब घास) अत्यंत प्रिय है। रोज उन्हें 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें।बप्पा को अकेला न छोड़ें। जब तक वे घर में विराजित हैं, कोई न कोई सदस्य हमेशा घर या उनके पास उपस्थित रहना चाहिए。प्रिय भोग: रोज सुबह-शाम बप्पा को उनके पसंदीदा मोदक या बूंदी के लड्डू और मौसमी फलों का भोग लगाएं।

गणपति बप्पा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!

नोट: भगवान गणेश से जुड़ी जन्म और अन्य पौराणिक कथाओं के अलग-अलग ग्रंथों/परंपराओं में कुछ विवरण भिन्न मिलते हैं; ऊपर दी गई कथा सबसे प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में से एक पर आधारित है।

धर्म।अध्यात्म।
भगवान गणेश की पूरी कथा: कैसे बने गजानन और क्यों कहलाए प्रथम पूज्य? जानिए गणपति से जुड़ी रोचक कहानी

धर्म-अध्यात्म डेस्क | भारत न्यूज़ सर्विस

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