‘‘ एक गांव ऐसा, गांधी के सपनों के जैसा…

दो साल पहले की ही बात है। इस गाँव की तस्वीर ऐसी न थीं। अपने गाँव से विवाह के बाद आई टुकेश्वरी एमए पास है तो क्या हुआ ? उसके पास कोई काम न था। गाँव वालों के अपने खेत तो थे, लेकिन इन खेतों में हरियाली सिर्फ बारिश के दिनों में ही नजर आती थीं। फसल बोते थे लेकिन दाम सहीं नहीं मिलने से कर्ज में लदे थे। गाँव का गणेश, रामाधार हो या सेन काका.. सभी अपने गांव को खुशहाल देखना चाहते थे। दुलारी के पति सालों पहले…

यह पकवान है छत्तीसगढ़ की शान, स्वाद और मिठास है इसकी पहचान, गढ़कलेवा में घुलने लगी छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के स्वाद की मिठास

रायपुर। जिस तरह गीत के साथ संगीत का, सुर के साथ ताल का, ध्वनि के साथ तरंग का तालमेल होता है और इनकी जुगलबंदी सबकों मंत्र-मुग्ध कर देती है, ठीक उसी तरह ही छत्तीसगढ़ का व्यंजन है ,जो बनाने वाले के अदभुत पारम्परिक पाककला के साथ उनकी मीठी और भोली बोली के चाशनी में डूबकर आपकों गढ़ कलेवा में कुछ इस तरह मिलेगी कि आप इसे खाते ही कहेंगे…वाह मजा आ गया….। निश्चित ही स्वाद के साथ मिठास भी आपको मिलेगा और एक बार खाने के बाद बार-बार खाने के…

युवाओं की प्रतिभा और कौशल निखारने हो रहा है, बेहतर प्रयास

रायपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रतिभावान युवाओं की प्रतिभा निखारने और तकनीकी कौशल को बेहतर करने के लिए मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के निर्देशन में कौशल विकास एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री श्री उमेश पटेल के मार्गदर्शन में तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग द्वारा अनेकों प्रयास किए जा रहे है। औद्योगिक संस्थानों की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए इंजीनियरिंग एवं पॉलिटेक्निक संस्थाओं में शैक्षणिक सत्र 2019-20 से पुनरीक्षित पाठ्यक्रम लागू किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को रोजगार के अवसर सुगमता से प्राप्त हो रहे हैं। इसी शैक्षणिक सत्र से 14 नवीन…

मिट्टी के दीये की बढ़ी मांग से कुम्हारों के मन में नई आस जगी

इस साल दीपावली के मौके पर पूरे छत्तीसगढ़ समेत नक्सल प्रभावित ज़िला नारायणपुर में भी बिजली की झालर और अन्य बिजली के उत्पादों की बिक्री पर खासा असर पड़ेगा। ऐसे में उन गरीब तबके के लोगों के मन में यह आस जग गई है जिनकी दिवाली हर साल दिवाली फीकी हो जाया करती थी। बिजली की झालरों की जगह लेने के लिए मिट्टी से बने खूबसूरत दीये (दीपक) पूरी तरह से तैयार होकर बाज़ार में बिकने के लिए उतर गए हैं। ये दीये इस बार लोगों के घरों को रौशन…

पौनी पसारी : परम्परागत व्यवसायों को नया जीवन देने की पहल

रायपुर। पौनी पसारी का नाम सुनते ही आज के पढ़े लिखे नौजवानों को अचरज होता है लेकिन यह हमारी छत्तीसगढ़ी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा शब्द है। इसका संबंध परम्परागत रूप से व्यवसाय से जुड़े लोगों को नियमित रूप से रोजगार उपलब्ध कराने से था। बदलती हुई परिस्थितियों में जब गांवों ने नगरों का स्वरूप लिया तो इन कार्यों से जुड़े लोगों के लिए हर घर में जाकर सुविधा देने में दिक्कत होने लगी तब उनके लिए एक व्यवस्थित बाजार की कल्पना हुई। वर्तमान समय में युवाओं को रोजगार दिलाने…

‘‘झेंझरी’’ पुस्तक पर केन्द्रित छत्तीसगढ़ लोकसंस्कृति के संदर्भ में संगोष्ठी संपन्न

साहित्य संगीत सांस्कृतिक मंच मुजगहन (धमतरी) द्वारा आयोजित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के सेवानिवृत हिन्दी विभागाध्यक्ष डाॅ. गोरेलाल चंदेल की पांच भागों में प्रकाशित लोकसंस्कृति के विविध आयाम पर केन्द्रित कृति ‘‘झेंझरी’’ पर जिला पंचायत धमतरी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी विजय दयाराम के. के मुख्य आतिथ्य, प्रोफे. त्रिभुवन पांडेय की अध्यक्षता, डाॅ. जीवन यदु, प्रोफे. सुरेश देशमुख, डाॅ. पीसीलाल यादव, प्रोफे. नत्थू तोड़े, रवि श्रीवास्तव, दुर्गा प्रसाद पारकर, बलदाऊ राम साहू के आतिथ्य में संगोष्ठी का कार्यक्रम साहित्य सदन में सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी की शुरूवात अतिथियों द्वारा मां सरस्वती…

आओ हम सब मिलकर दूर करें कुपोषण

रायपुर। आज भारत ने चन्द्रयान पर सफलता अर्जित कर लिया है। हम एक ओर ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि पर गर्व कर रहें है। वही दुसरी ओर कुपोषण के मामले में भारत का प्रतिशत अन्य देशों की तुलना में अधिक है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा छत्तीसगढ़ में कुपोषण एवं एनीमिया को जड़ से समाप्त करने का संकल्प लिया गया है। वास्तव में कुपोषण नई पीढ़ियों के बुनियाद पर हमला करता है। कुपोषण हम सबके लिए चिंता का विषय है। आज दुनिया में किसी भी जंग से ज्यादा खतरा कुपोषण से है।…

पूरा देश साल में सिर्फ एक दिन 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाता है, लेकिन बॉलीवुड हर हफ्ते हिन्दी को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाता है

हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी को लेकर विशेष चर्चा होती है। नगरों-महानगरों में हिन्दी के विद्वान इक्कठा होते हैं और इसकी दशा-दूर्दशा पर घंटों बहस चलती है। हिन्दी के उत्थान के लिए कई योजनाएं बनती हैं। लेकिन कितनी धरातल पर उतर पाती हैं, इसका हिसाब लगा पाना मुश्किल है। लेकिन जैसा हम सभी हर दिन देखते-समझते है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि हिन्दी की दशा दयनीय नहीं है, अगर इसकी समानता इंग्लिश या किसी अन्य भाषा से ना करें तो। क्योंकि…